नाग पुजा
भगवान शिव का प्रिय महीना सावन चल रहा है। सावन का महीना हिंदू धर्म के मानने वालों के लिए बहुत खास होता है। ऐसा माना जाता है कि इस महीने में भगवान शिव शिवलिंग में निवास करते हैं। सप्ताह के सोमवार शंकर भगवान को समर्पित माने गए हैं और सावन में इस दिन की मान्यता और बढ़ जाती है। सावन का महीना आते ही भारतीय त्योहारों का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। सावन में नाग पंचमी का पर्व भी मनाया जाता है।
भगवान शिव अपने आभूषण के तौर पर नाग को धारण करते हैं। सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग देव की पूजा करने की रिवायत है। नागपंचमी के दिन भगवान शिव की खास पूजा की जाती है और सावन का सोमवार होने की स्थिति में लोग उनका आशीर्वाद लेने शिवालय भी जाते हैं।
भारत देश कृषिप्रधान देश था और है। सांप खेतों का रक्षण करता है, इसलिए उसे क्षेत्रपाल कहते हैं। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके सांप हमारे खेतों को हराभरा रखता है।
साँप हमें कई मूक संदेश भी देता है। साँप के गुण देखने की हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए। भगवान दत्तात्रय की ऐसी शुभ दृष्टि थी, इसलिए ही उन्हें प्रत्येक वस्तु से कुछ न कुछ सीख मिली।
साँप सामान्यतया किसी को अकारण नहीं काटता। उसे परेशान करने वाले को या छेड़ने वालों को ही वह डंसता है। साँप भी प्रभु का सर्जन है, वह यदि नुकसान किए बिना सरलता से जाता हो, या निरुपद्रवी बनकर जीता हो तो उसे मारने का हमें कोई अधिकार नहीं है। जब हम उसके प्राण लेने का प्रयत्न करते हैं, तब अपने प्राण बचाने के लिए या अपना जीवन टिकाने के लिए यदि वह हमें डँस दे तो उसे दुष्ट कैसे कहा जा सकता है? हमारे प्राण लेने वालों के प्राण लेने का प्रयत्न क्या हम नहीं करते? लेकिन शास्त्रों में कहीं पर भी इस तरह की साधना का प्रावधान नहीं है।
वेदों में, और गीता जी,कुरान, बाइबल आदि धर्म ग्रंथों में बताई गई साधना ही शास्त्र अनुकूल है। इनके अतिरिक्त अन्य कोई भी साधना करना व्यर्थ है। आज तक जितने भी ऋषि, मह्रिषी, पंडित आदि हुए हैं वो इनके विपरीत ज्ञान देकर गलत साधना से करोड़ों मानव जाती को अंधकार में धकेल दिया है। परन्तु परमात्मा अपनअपने सत ज्ञान के लिए स्वयं आते हैं या अपना अंश धरती पर भेजते हैं। वर्तमान में भारत देश कृषिप्रधान देश था और है। सांप खेतों का रक्षण करता है, इसलिए उसे क्षेत्रपाल कहते हैं। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके सांप हमारे खेतों को हराभरा रखता है।
साँप हमें कई मूक संदेश भी देता है। साँप के गुण देखने की हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए। भगवान दत्तात्रय की ऐसी शुभ दृष्टि थी, इसलिए ही उन्हें प्रत्येक वस्तु से कुछ न कुछ सीख मिली।
साँप सामान्यतया किसी को अकारण नहीं काटता। उसे परेशान करने वाले को या छेड़ने वालों को ही वह डंसता है। साँप भी प्रभु का सर्जन है, वह यदि नुकसान किए बिना सरलता से जाता हो, या निरुपद्रवी बनकर जीता हो तो उसे मारने का हमें कोई अधिकार नहीं है। जब हम उसके प्राण लेने का प्रयत्न करते हैं, तब अपने प्राण बचाने के लिए या अपना जीवन टिकाने के लिए यदि वह हमें डँस दे तो उसे दुष्ट कैसे कहा जा सकता है? हमारे प्राण लेने वालों के प्राण लेने का प्रयत्न क्या हम नहीं करते?
पूर्ण परमात्मा कबीर देव जी का सतभक्ति ज्ञान देने के लिए धरती पर अवतरित होते हैं। या अपना अंंश भेजते हैं। वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज सतभक्ति का ज्ञान देकर हम जीवों का उद्धार कर रहे हैं। इस सतभक्ति ज्ञान को अपना कर जो भी जीव शरण मे आया है वह अवश्य ही लाभान्वित हुआ है।
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| सर्प |
भगवान शिव का प्रिय महीना सावन चल रहा है। सावन का महीना हिंदू धर्म के मानने वालों के लिए बहुत खास होता है। ऐसा माना जाता है कि इस महीने में भगवान शिव शिवलिंग में निवास करते हैं। सप्ताह के सोमवार शंकर भगवान को समर्पित माने गए हैं और सावन में इस दिन की मान्यता और बढ़ जाती है। सावन का महीना आते ही भारतीय त्योहारों का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। सावन में नाग पंचमी का पर्व भी मनाया जाता है।
- क्या आवश्यक है नाग पूजा ?
भगवान शिव अपने आभूषण के तौर पर नाग को धारण करते हैं। सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग देव की पूजा करने की रिवायत है। नागपंचमी के दिन भगवान शिव की खास पूजा की जाती है और सावन का सोमवार होने की स्थिति में लोग उनका आशीर्वाद लेने शिवालय भी जाते हैं।
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| सर्प व सपेरा |
- शास्त्र अनुसार साधना हैं नाग पुजा ?
भारत देश कृषिप्रधान देश था और है। सांप खेतों का रक्षण करता है, इसलिए उसे क्षेत्रपाल कहते हैं। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके सांप हमारे खेतों को हराभरा रखता है।
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| नाग पुजा |
साँप हमें कई मूक संदेश भी देता है। साँप के गुण देखने की हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए। भगवान दत्तात्रय की ऐसी शुभ दृष्टि थी, इसलिए ही उन्हें प्रत्येक वस्तु से कुछ न कुछ सीख मिली।
साँप सामान्यतया किसी को अकारण नहीं काटता। उसे परेशान करने वाले को या छेड़ने वालों को ही वह डंसता है। साँप भी प्रभु का सर्जन है, वह यदि नुकसान किए बिना सरलता से जाता हो, या निरुपद्रवी बनकर जीता हो तो उसे मारने का हमें कोई अधिकार नहीं है। जब हम उसके प्राण लेने का प्रयत्न करते हैं, तब अपने प्राण बचाने के लिए या अपना जीवन टिकाने के लिए यदि वह हमें डँस दे तो उसे दुष्ट कैसे कहा जा सकता है? हमारे प्राण लेने वालों के प्राण लेने का प्रयत्न क्या हम नहीं करते? लेकिन शास्त्रों में कहीं पर भी इस तरह की साधना का प्रावधान नहीं है।
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| नागदेव |
- सही भक्ति क्या है ?
वेदों में, और गीता जी,कुरान, बाइबल आदि धर्म ग्रंथों में बताई गई साधना ही शास्त्र अनुकूल है। इनके अतिरिक्त अन्य कोई भी साधना करना व्यर्थ है। आज तक जितने भी ऋषि, मह्रिषी, पंडित आदि हुए हैं वो इनके विपरीत ज्ञान देकर गलत साधना से करोड़ों मानव जाती को अंधकार में धकेल दिया है। परन्तु परमात्मा अपनअपने सत ज्ञान के लिए स्वयं आते हैं या अपना अंश धरती पर भेजते हैं। वर्तमान में भारत देश कृषिप्रधान देश था और है। सांप खेतों का रक्षण करता है, इसलिए उसे क्षेत्रपाल कहते हैं। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके सांप हमारे खेतों को हराभरा रखता है।
साँप हमें कई मूक संदेश भी देता है। साँप के गुण देखने की हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए। भगवान दत्तात्रय की ऐसी शुभ दृष्टि थी, इसलिए ही उन्हें प्रत्येक वस्तु से कुछ न कुछ सीख मिली।
साँप सामान्यतया किसी को अकारण नहीं काटता। उसे परेशान करने वाले को या छेड़ने वालों को ही वह डंसता है। साँप भी प्रभु का सर्जन है, वह यदि नुकसान किए बिना सरलता से जाता हो, या निरुपद्रवी बनकर जीता हो तो उसे मारने का हमें कोई अधिकार नहीं है। जब हम उसके प्राण लेने का प्रयत्न करते हैं, तब अपने प्राण बचाने के लिए या अपना जीवन टिकाने के लिए यदि वह हमें डँस दे तो उसे दुष्ट कैसे कहा जा सकता है? हमारे प्राण लेने वालों के प्राण लेने का प्रयत्न क्या हम नहीं करते?
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| पूर्ण संत रामपाल जी |
पूर्ण परमात्मा कबीर देव जी का सतभक्ति ज्ञान देने के लिए धरती पर अवतरित होते हैं। या अपना अंंश भेजते हैं। वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज सतभक्ति का ज्ञान देकर हम जीवों का उद्धार कर रहे हैं। इस सतभक्ति ज्ञान को अपना कर जो भी जीव शरण मे आया है वह अवश्य ही लाभान्वित हुआ है।





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