चलिए जानते हैं 8400000 योनियों के भोगने के पश्चात ही मानव शरीर प्राप्त होता है ।ऐसे प्राप्त नहीं होता है ।अब जहां यह बताना अवश्य की है कि मानव शरीर दो प्रकार से प्राप्त होता है 8400000 प्राणियों के शरीरों में कष्ट भोगने के पश्चात मानव शरीर प्राप्त होता है , यह हैं क्रमानुसार ।
शुभ कर्म अनुसार मानव शरीर प्राप्त होना किसी किसी प्राणी के शुभ कार्य अधिक होने से उसे तुरंत मानव शरीर प्राप्त होता है ऐसा व्यक्ति परमात्मा की खोज में लगा रहता है ।जैसा भी उसको ज्ञान प्राप्त होता है वैसा ही वह भक्ति साधना करने लगता है ।यहां पर गीता जी का एक अध्याय है उसका विवरण देना अनिवार्य है-- गीता जी के अध्याय 16 श्लोक 23, 24 में कहा है कि शास्त्र विधि को त्याग कर जो साधक मनमाना आचरण करते हैं उनको न तो कोई सुख प्राप्त होता है ना कोई सिद्धि प्राप्त होती है और ना ही कोई लाभ मिलता है। यदि उस मानव शरीर प्राप्त प्राणी को शास्त्र अनुकूल भक्ति साधना नहीं मिलती है तो वह मानव अपना जीवन नष्ट कर जाता है फिर 8400000 योनियों में उसे कष्ट उठाने ही पढ़ते हैं । यदि पूर्ण संत द्वारा उसे सत भक्ति मिल जाए तो वह प्राणी शीघ्र भक्ति साधना स्वीकार करके अपना और अपने परिवार का जीवन सफल कर लेता है।
अब आते हैं क्रमानुसार मानव शरीर प्राप्त प्राणी पर । इस प्रकार प्राप्त मानव जीवन वाले मनुष्य परमात्मा की भक्ति साधना को नहीं शीघ्र अपनाते हैं ।यदि वह मनुष्य किसी के कहने सुनने से या बार-बार आग्रह करने पर भी सत भक्ति करता है तो उसका मन इस भक्ति में नहीं लगता है। और वह शीघ्र ही फिर से अआन उपासना करने लग जाता है। यहां पर कबीर जी का एक दोहा ऐसे व्यक्तियों के लिए एकदम सटीक है
कबीर,पिछले पाप से हरि चर्चा न सुहावे के उंघे के उठ चले या और ए बात चलावे।
ऐसे व्यक्तियों की आत्मा पर पाप कर्मों का ज्वर चढा है उसका उपचार है कि न चाहते हुए भी सत भक्ति करनी चाहिए जिससे धीरे-धीरे पाप कम हो जाएंगे फिर वही व्यक्ति 200 किलोमीटर सफर करके भी पूर्ण परमात्मा के सत्संग सुनना जाता है ।क्योंकि उसकी आत्मा स्वस्थ हो चुकी है उसको परमात्मा की महिमा सुनने की भूख लगी है।
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